संछिप्त इतिहास


भारत में ऋषि मुनियों और संत महापुरुषों के चरणों से पवित्र यह पावन धरा की अनेक गाथाएं हैं जिसे जग जानता है, उसी प्रकार अवध क्षेत्र अयोध्या के प्रथम राजा इक्ष्वाकु थे जिनकी आठवीं पीढ़ी में मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान् श्री रामचंद्र ने अवतार लिया था ,उन्हीं राजर्षी इच्छवाकु नरेश के साकेत अर्थात् अयोध्या में जनपद नवसृजित अंबेडकर नगर की पावन धरती पर जनपद अंबेडकर नगर से 25 किलोमीटर पूर्व दिशा में स्थित एक ग्राम किछौछा (कृंछ - मुंचार्क) के नाम से प्रसिद्ध है, यह स्थान प्राचीन काल में मनोहारी उपवन था, इसके किनारे से एक टेढ़ी नदी (झील) बहती थी, यहीं पर वाममार्गी सिद्ध संत श्री बाबा तर्पणनाथ जी का मठ प्रसिद्ध* प्राचीन मंदिर था!ै।

संत श्री बाबा तर्पणनाथ जी अवधूत महात्मा, प्रकांड विद्वान सिद्ध संत थे, जिनका यश कीर्ति चारों दिशाओं में फैल रही थी। हर संप्रदाय धर्म के रोगी बिना किसी भेदभाव के इस स्थान पर जीवन और स्वास्थ्य पाते थे, संतान हीन माताओं बहनों की मनोवांछित फल प्राप्त होती थी भयानक रोगों से मुक्ति दिलाने वाले इस मंदिर को जनमानस श्रद्धा से पूजने लगा ,कुछ लोग यहीं आकर बसने भी लगे, धीरे धीरे यह तपोवन बस्ती फ़िर ग्राम का रूप ले लिया। है।

इतिहासकार डॉ लवकुश शर्मा पी.एच.डी के अनुसार इस मनोहारी तपोवन को "कृंछ - मुंचार्क" नाम से प्रसिद्धी मिल गई जिसका तात्पर्य कृच्छ = रोग, मुंच=मुक्ति, अर्क=सूर्य। अर्थात् रोग से मुक्ति दिलाने वाला सूर्य। किछौछा इसी शब्द का अपभ्रंश है किन्तु किछौछा का शाब्दिक अर्थ किसी भी भाषा में नहीं है। यहां के इतिहास को मिटाने की मुग़ल शासन में अनेक प्रयास होते रहे * जो आज भी इस्लामी करण का शिकार है जैसे किछौछा धाम को अशरफ़ पुर किछौछा ,आदि। ऐसे महापुरुषों ( जैसे:- शिव बाबा, महात्मा गोविन्द साहब , औघड़ बाबा इत्यादि ) के नामों से जुड़ी अम्बेडकर नगर (पूर्वनाम-अकबरपुर) जनपद से लगभग 25 किलोमीटर पूर्व नगर पंचायत अशरफ पुर किछौछा ( कमला नगर ) की पावन धरती पर एक प्राचीनतम् चमत्कारिक मंदिर (देवस्थान) है जो जन-मानस की श्रद्धा और विश्वास का प्रमुख केंद्र है । जहाँ देश के कोने-कोने से आने वाले दीन-दुखियों श्रद्धालुओं को दर्शन , पूजा-अर्चना, मनोवांछित फल की प्राप्ति, ग्रह- बाधा-शांति ,ब्रह्म बाधा,प्रेत बाधा, किया-करतब आदि से छुटकारा व निःसंतान दंपति को संतान प्राप्ति होती है । यहां हमेशा हजारों श्रद्धालुओं का ताँता ा रहता है।।

यह ब्रह्मस्थान - कृपानिधान,दीनदयाल,भक्तवत्सल अनंत सिद्ध संत श्री बाबा कमला पंडित जी महाराज का मन्दिर वास्तव में गंगा-जमुनी संस्कृति की एकता रूपी धागे में पिरोती हुई एकमात्र स्थान है,हिन्दू-मुस्लिम ही नहीं अपितु सभी जाति, धर्म, संप्रदाय का अद्भुत समावेश व समान आस्था का केंद्र है।

आपको बताते चले की 777 वर्ष पूर्व यह स्थान अत्यंत मनोहारी उपवन , दक्षिण से उत्तरी छोर से लेकर पूर्वी छोर तक एक टेढ़ी नदी से घिरा हुआ था जो वर्तमान समय में संकीर्ण हो कर झील के रूप में परिवर्तित (तालाब)हो गई है । इसी नदी के किनारे सिद्ध महापुरुष योगी गुरु श्री तर्पणनाथ जी व भूतनाथ अपने सैकड़ों शिष्यों के साथ रहते थे , जहां कई शत की संख्या में मनोहारी छोटे-बड़े शिवालय अर्थात् शिव मंदिर थे जो गुरु तर्पणनाथ द्वारा निर्मित थे और घंटा, घड़ियाल, शंखनाद आदि की गूंज चारों दिशाओं में सुनाई देती व इस स्थान की कीर्ति दूर-दूर तक फैली हुई थी । भगवान् शिव की भक्ति उपासना व तपस्या से मिली ईश्वरीय शक्ति व ब्रम्हज्ञान के द्वारा भूत-प्रेत बाधा से ग्रसित लोगों का कल्याण व मनोकामना पूर्ति के लिए प्रसिद्द थे। उन्ही की सेवा में (कोशल शोध संस्थान के चेयर मैन राम वन गमन मार्ग के अंवेषणकर्ता प्रसिद्ध इतिहास कार डॉ. राम विहारी के अनुसार.....) श्री आत्माराम जी पत्नी ज्ञानमती देवी जो कि निःसंतान दम्पति एक संपन्न परिवार से सेवा करते तथा शिव की आराधना किया करते शिव भक्त थे, गुरू तर्पण नाथ जी महाराज के सेवा में तत्पर रहते थे । धीरे-धीरे ढलती उम्र के कारण मन में कठोर अशांति कुरेद रही थी की गोद अभी तक सूनी है कोई संतान नहीं है।

संतान न होने के कारण अगल बगल के लोग प्रातः काल मुंह देखने से कतराते और ताने मारा करते थे, मन में भीषण ग्लानी उत्पन्न होने लगी परन्तु पुत्र प्राप्ति की कामना अपने गुरु तर्पण नाथ जी से व्यक्त करने का साहस नही कर पाए......., अंत में दृढ़ निश्चय किया की हमें अपनी मनोव्यथा गुरु जी से अवश्य ही कहना चाहिए , आखिरकार अगली सुबह ही अपने गुरु संत श्री तर्पणनाथ जी के शरणागत हुए, श्री गुरु भगवान शिव की उपासना ध्यान में लीन थे......कुछ समय के पश्चात् उपासना के पूर्ण होते ही तुरंत आप आत्माराम पत्नी ज्ञानमती जी गुरु के चरणों में जा पड़े और भावुक हो आपके अश्रु से गुरूजी के चरण भीगने लगे ...... गुरु ने इन दोनों दम्पत्ती की व्यथा अपने अलौकिक, अध्यात्मिक शक्ति से सब कुछ पल भर में ज्ञात कर लिया और और अंतरात्मा से मुसकुरा कर कहा.......आप दोनों मेरी सेवा हमेशा नि:स्वार्थ करते हैं परम भक्त है परन्तु मैं कर भी क्या कर सकता हूँ जो भाग्य में लिखा है वह होकर ही रहेगा... इतना सुनते ही तुरंत आत्माराम बोल उठे...गुरु जी आपके कहने का आशय हमारी समझ में नहीं आया आप क्या कहना चाहते हैं?

गुरु जी ने कहा ईश्वर की विडम्बना के आगे किसी की नही चलती आप दोनों के भाग्य में संतान का सुख विधाता ने लिखा ही नहीं है। यह बात सुनकर दोनों सेवक दंपति के ह्रदय पर भीषण वज्रपात सा हुआ और काफी सोच को प्राप्त हुए मन व्याकुल हो गया कंठरुधगया कुछ कह न सके........ ! कुछ समय पश्चात धीरज धारण करके आत्माराम जी बोले गुरु जी आपके जीवन भर की भक्ति का यह कैसा फल हमें देखने को मिल रहा है क्या हमारी इच्छा कभी पूर्ण नहीं होगी क्या कोई भक्त (शिष्य) गुरु और ईश्वर पर विश्वास करेगा आप तो ब्रम्ह ज्ञानी है आप से कुछ असंभव नहीं...!......गुरु जी निरुत्तर हो गये........!

अंततः गुरु तर्पण नाथ जी काफी ज्ञानोपदेश दिए, नीति की बातें समझाई परन्तु आत्माराम जी को कुछ भी समझ नहीं आया, और अपने हठ पर अडिग रहे...........अंत में आप श्री गुरु जी ने कहा की आत्माराम तुम्हारी पुत्र प्राप्ति की लालसा अवश्य पूर्ण होगी, तुम्हारे बाँझपन का कलंक मिट जायेगा परन्तु मुझे एक वचन चाहिए... कि जब तुम्हारी संतान ५ वर्ष की अवस्था का होगा तदुपरान्त आप मुझे मुझे सौंप देंगे..... इस बात पर शिव भक्त श्री आत्माराम जी पुनः शोक को प्राप्त हुए...कि खुशियाँ हमारे आँगन में आकर फिर वापस चली जाएगी....... गुरु जी आत्माराम के मन की बात भांप लिए और कहा... आत्माराम संकोच मत करो सोच को त्याग दो तुम्हारी संतान बहुत तेजस्वी और जन-कल्याणकारी होगी जिसका यश कीर्ति संसार में फैलेगा जिसके कारण तुम्हारा भी नाम युगों तक होगा ...,यद्दपि यह बालक हमारे पास ही रहेगा परंतु जब भी इस बालक की मोह ( ममता ) तुम्हे विचलित करेगी तादुपरांत ही तुम मिलने आ सकते हो, यह बात सुनकर पंडित आत्माराम जी पत्नी ज्ञानमती जी की वेदना कम हुई और धैर्य धारण करके कहा मुझे आपकी आज्ञा शिरोधार्य है, गुरु तर्पण नाथ महाराज जी ईश्वर का ध्यान किये और शिव इच्छा से विभूति दिए एवं पुत्र प्राप्ति का आशीर्वाद देकर शिव जी के तप में लीन हुए, दोनों दम्पति गुरु के चरणों में सिर नवाकर अपने गृह को गये । गुरु द्वारा मिला हुआ प्रसाद विभुति माता ज्ञानमती जी श्री गुरु जी व शिव का स्मरण करके ग्रहण किया। समय बीता ... माता ज्ञानमती गर्भावस्था को प्राप्त हुईं और धीरे-धीरे इन्तजार की घड़ियाँ भी समाप्त हुई जिस पल का बेसब्री से इंतज़ार था वह पावन समय आया।

शुभ समय कार्तिक शुक्ल पक्ष एकादशी का पावन दिन संवत् विक्रम - 1301को ब्रह्म मुहूर्त में बहुत ही सुन्दर सुकोमल अद्भुत तेजस्वी बालक का जन्म हुआ । बहुत वर्षो पर्यंत सूने पड़े गृह में बालक की किलकारियाँ गूँज उठी, ग्राम की महिलाओं ने सोहर व मंगल गीत गाकर खुशियाँ व्यक्त की बालक की छवि देखकर माता -ज्ञानमती पिता -आत्माराम जी के मन में खुशियाँ का समुद्र उमड़ पड़ा था दोनों हाथ जोड़कर गुरु जी को तथा शिव को कर जोड़कर मानसिक नमन किए, और गरीब व दीन-दुखियों तथा ब्राह्मणों को दान किये और कुछ दिन (सूतक) के उपरांत माता -पिता अपने तेजस्वी पुत्र को लेकर श्री गुरु का आशिर्वाद प्राप्त करने आते हैं । आप सिद्ध संत गुरु तर्पणनाथ जी अत्यंत प्रसन्न हुए, बालक की छवि तेजस्वी कमल पुष्प की भांति सुन्दर व सुकोमल होने के कारण आपने आपका नाम कमलनाथ रखा तथा आशीर्वाद प्रदान किए और माता पिता शिर नवा कर अपने गृह आए समय बीतता गया , और आप बचपन से ही अपने माता-पिता के साथ शिव जी की पूजा भक्ति करते।

आखिरकार वह समय भी आया जब बालक कमाल नाथ की उम्र ५ वर्ष की हुई तब माता-पिता ने गुरु वचन को पूर्ण करने हेतु अपने वक्ष स्थल को कठोर कर अपने पुत्र कमलनाथ को गुरु तर्पणनाथ जी के चरणों में समर्पित कर दिए तत्पश्चात इस तेजस्वी बालक की देख-रेख शिक्षा-दीक्षा गुरु द्वारा प्राप्त होने लगी गुरु तर्पणनाथ जी से प्राप्त ज्ञान व विद्या को आप सरलता से सीख जाते और हमेशा एकांत में शिव की उपासना में लीन रहा करते। कुछ समय पश्चात् आप गुरु द्वारा प्राप्त व सभी विद्याओं में निपुण पंडित हो गए । अपनी ज्ञान कौशलता के कारण सैकड़ों शिष्यों में सर्व श्रेष्ठ एवं ब्रम्हज्ञानी हुए । गुरु की भांति ही जन कल्याण करते रहे , हमेशा गुरु की सेवा में तत्पर रहते थे, श्रीगुरु आपके कार्य से प्रसन्न रहा करते*

कालान्तर में गुरु तर्पणनाथ जी समाधिस्थ होने से पहले अपना समस्त कार्यभार अपने परम् प्रिय शिष्य ब्रह्मज्ञानी कमलनाथ पंडित जी को सौंपकर कहा तुम अब आए हुऐ दीन जनों का कल्याण निःस्वार्थ करते रहना और अपनी अंतिम समय में शिव के ध्यान में ब्रम्ह में विलीन समाधिस्थ हुए।

आप अपने गुरु के आदेशानुसार श्रीगुरु द्वारा प्राप्त विद्याओं एवं अलौकिक शक्तियों तथा ईश्वरीय तपोबल ब्रम्हज्ञान से जन-कल्याण करने लगे और आपका यश कीर्ति दूर-दूर तक फैलने लगी भक्तों व श्रद्धालुओं का आवागमन बढ़ता गया। आप अपने श्रीगुरु तर्पण नाथ जी के तपोस्थली से ५०० मीटर दूर उत्तर दिशा में टेढ़ी नदी ( वर्तमान समय में तालाब ) के किनारे मनोहारी उपवन में ईश्वर की उपासना किया करते थे, जहाँ वर्तमान में आज आपकी समाधि स्थल विद्यमान है |

आपकी की यश की ख्याति सुनकर मध्य प्रदेश के सतना जिले के राजा रानी जो कुष्ट रोग से ग्रसित थे बहुत उपचार के बाद दोनों (कमला नगर) किछौछा धाम में आये आपके चरण में शीश नवाकर आपकी विनय स्तुति प्रार्थना किये*..... जिससे प्रसन्न होकर आप राजा रानी को आदेश दिए कि आपने विभूति दी आप ने कहा कि दोनों यह विभूति शरीर में मलकर नदी में ईश्वर का स्मरण कर ॐ नमः शिवाय मंत्र का जाप करते हुए (5 डुबकी ) स्नान कीजिये आपके आदेशानुसार राजा रानी दोनों मिलकर ईश्वर का ध्यान करके ॐ नमः शिवाय मंत्र का उच्चारण करते हुए 3 डुबकी लगाए ही थे कि तत्पश्चात जैसे ही उनकी दृष्टि अपने शरीर पर पड़ी तो उन्होंने देखा की कुष्ट रोग समाप्त हो चुका था उन्हें ऐसा प्रतीत हो रहा था की हमें कोई रोग ही नहीं था तत्पश्चात् आपके नाम का जय उद्घोष करते हुए आप के चरणों में गिर कर कहा की आपकी कृपा व आशीर्वाद से हमें नया जीवन मिला है हम आपका गुणगान जीवन पर्यन्त करते रहेंगे... राजा रानी ने कहा की आपका नाम कमलनाथ पंडित नहीं पंडित कमला होना चाहिए तभी से आप कमला पंडितअथवा कमाल पंडित के नाम से विख्यात हुए । श्री बाबा कमाल पंडित जी का गुण-गान करते हुए आप से आज्ञा लेकर राजा रानी अपने राज्य को वापस जाने के लिए आप से विनय की तब आप सिद्ध संत श्रीबाबा कमला पंडित जी महाराज ने दोनों राजा-रानी से कहा कि- जाओ और ईश्वर शिव का नाम जपते रहना, राजा-रानी बाबा कमाल पंडित जो को दण्डवत् प्रणाम करके अपने राज्य वापस चले गये।

राजा-रानी अपने राज्य में पहुँचे तो वहाँ के नगर वासी राजा से पूछने लगे महाराज औरमहारानी आप दोनो इस रोग से कहाँ से और कैसे मुक्त हुए, लोगों के पूछने पर राजा ने बताया कि किछौछा धाम, प्रान्त-अवधपुर( वर्तमान में अयोध्या )के सिद्ध संत श्री गुरु तर्पणनाथ जी के शिष्य श्री संत बाबा कमाल पंडित जी के चमत्कार से हम दोनों पति-पत्नी इस रोग से मुक्त हो गये और ऐसे अनगिनत घटनायें रोज वहां होती है,जिसे बता पाना दुष्कर कार्य है।

आप अपने गुरु के सैकड़ों शिष्यों में सर्वश्रेष्ठ थे तथा आपके शिष्यों में मुख्य स्वामी पवार जी आपके बेहद करीबी शिष्य थे आपकी सेवा करते ,स्वामी चन्द्रिका देव जी तथा मंगल देव जी आपके द्वारपाल सुरक्षा में जो हमेशा तत्पर रहा करते थे,आप अपने श्री गुरु तर्पण नाथ जी की भांति ही जनकल्याण करते रहे आपकी शरण में जो भी रोते हुए आता वह आपके कृपा प्रसाद से हँसते हुए जाता है।

वर्षों उपरांत जब आपकी इच्छा ब्रह्मलीन होने की हुई तो आप अपना कार्य-भार और स्थान की गरिमा भंग न हो इसके लिए करीबी शिष्य भक्त पवार को आदेश दिए की आप ही यहाँ के रख-रखाव देख-रेख व आने वाले श्रद्धालुओं को किसी भी प्रकार की परेशानी न हो जिम्मेदारी संभालें जो भीश्रद्धा से मेरी शरण में आएगा सच्चे मन से मेरा प्रशाद ग्रहण करेगा उसके संकट दूर होगा उसकी सात्विक मनोकामना शीघ्र ही पूर्ण होगी। मैं तुम्हारी सेवा से प्रसन्न हूं तुम्हारी आने वाली पीढ़ियां मेरी सेवा भक्ति करती रहेंगी मैं सदैव तुम्हारे साथ रहूँगा मेरी कृपा सदैव मेरे सेवकों पर रहेगी और उन्ही के द्वारा पूजा,हवन,जाप आदि मुझे अवश्य ही स्वीकार होगा।

मेरे समाधिस्थ होने के लिए योगमुद्रा (चौकोनी) समाधि बनाने की तैयारी करो यह वाक्य सुनकर भक्त पवार सभी शिष्य अत्यंत चिंतित और व्याकुल हो गये और फिर गुरु के आदेशानुसार चौकोनी समाधि की खुदाई आरंभ की कुछ ही समय में समाधि तैयार हो गयी पंडित कमला जी महाराज ( कमलनाथ ) समाधि में प्रवेश से पूर्व ही शिष्यों को आदेश दिए की मेरे समाधिस्थ होने के पश्चात ऊपर से ढ़क देना मैं सदा तुम्हारे साथ ही रहूँगा और समाधि में प्रवेश कर योग-मुद्रा में लीन हुए ऊपर से शिष्यों ने समाधि का आवरण किए। लगभग १ माह बीता शोकाकुल शिष्यों से रहा नहीं रहा गया और अपना धीरज त्याग चुके तथा गुरु जी के बिना अधीर हो चुके थे अतः गुरु श्री कमला पंडित जी महाराज की स्थिति को जानना चाहा और भक्त पवार ने समाधि के उपरी आवरण को हटाकर देखने का प्रयास किया जैसे ही आवरण हटाया ही था कि कई सूर्यों जैसा तेजपुंज चारों तरफ ब्याप्त हो गया, किसी को कुछ समझ नहीं आया भयभीत होकर कांप उठे तुरंत ही उन्होंने उस आवरण को पूर्ववत् रख दिया और सभी लोग मिलकर स्तुति, ईश्वर शिव से प्रार्थना करने लगे । कुछ समय पश्चात् वह दिव्य तेज समाधि में विलीन हुआ, सभी शिष्य प्रतिदिन आपकी समाधि पर आपका पूजन करते रहते जिसकी परम्परा आज भी चली आरही।

आपका ब्रह्ममय तेज-पुंज स्वरुप यह योगरुपी समाधि स्थल युगों-युगों तक समस्त मानव-जाति का कल्याण करने वाला , मनोवांछित फल प्रदान करने वाला, रोग दुःख ,बलाय-बाधा,ग्रह शांति प्रदान करने वाला निवारण करने वाला सिद्ध पीठ सदा पूज्यनीय है ।

संवत् विक्रम 1437 में अगहन मास की पूर्णिमा की तिथि को आप ब्रम्हलीन समाधिस्थ हुए । तभी से अगहनिया मेले की सुरुआत भी हुई, भक्त पवार आपकी सेवा तथा देख रेख करने लगे और उन्ही की पीढ़ी दर पीढ़ी आपकी सेवा करते चले आ रहे हैं,आपकी (श्री श्री 1008 श्री स्वामी भक्त पवार जी महाराज )आठवीं पीढ़ी श्री श्री 1008 श्री स्वामी संत प्रसाद जी महाराज को अप्रत्यक्ष रूप से दर्शन दिए, हर कार्य के लिए आदेश देते और आप १५ दिसम्बर २०१९ ई. में नश्वर शरीर को त्याग कर पञ्च तत्व में विलीन गंगालाभ(जल समाधि) लिए।

इन्ही के सुपुत्र वर्तमान महंथ श्री रामनयन जी महराज एवं पुजारी श्री रामशंकर जी महराज, पुजारी श्री श्यामसुंदर, पुजारी श्री मुरली प्रसाद जी के देख रेख में प्रतिवर्षकार्तिक शुक्ल पक्ष एकादशी के दिन बड़े ही परम पूज्यनीय अनंत बाबा श्री कमला पंडित जी महाराज की जयंती हर्सोल्लास के साथ मनाया जाता है जो की ३ तीन दिवसीय कार्यक्रम होता है जिसमें दूर दराज से हजारों की संख्या में लोग आते हैं दर्शन करते हैं उनकी अनेक प्रकार कि बलाय-बाधा आदि से मुक्ति मिलती है आपके शरण में हर संप्रदाय मज़हब के लोग आते हवन,जाप, कथा पूजा कराते आरती में समलितहोते हैं उनकी मनोकामना पूर्ण होती है दरगाह किछौछामें आये हुए सभी भक्त, श्रद्धालुओं का दर्शन आपके बगैर दर्शन किये अधूरा ही रहता है।

{ संतान न होने के कारण अगल बगल के लोग प्रातः काल मुंह देखने से कतराते और ताने मारा करते थे, मन में भीषण ग्लानी उत्पन्न होने लगी परन्तु पुत्र प्राप्ति की कामना अपने गुरु तर्पण नाथ जी से व्यक्त करने का साहस नही जुटा पाए अंत में दृढ़ निश्चय किया की हमें अपनी मनोव्यथा गुरु जी से अवश्य ही कहना चाहिए } आखिरकार अगली सुबह ही गुरु तर्पण नाथ जी की शरण में पहुंचे, गुरु भगवान शिव की उपासना में ध्यान लगाये हुए थे...कुछ समय के बाद जब उपासना पूर्ण होते ही तुरंत पंडित आत्माराम पत्नी ज्ञानमती जी गुरु के चरणों में जा पड़े और भावुक हो गये...तो गुरु ने इन दोनों दम्पत्ती की व्यथा अपने अलौकिक, अध्यात्मिक शक्ति से सब कुछ पल भर में ज्ञात कर लिया और कहा... आप दोनों मेरी सेवा हमेशा निस्वार्थ करते हैं परम भक्त है परन्तु मैं कर भी क्या कर सकता हूँ जो भाग्य में लिखा है वह होकर ही रहेगा...तुरंत पंडित आत्माराम बोल उठे...गुरु जी आपके कहने का आशय हमारी समझ में नहीं आया आप क्या कहना चाहते हैं?

गुरु जी ने कहा ईश्वर की विडम्बना के आगे किसी की नही चलती आप दोनों के भाग्य में संतान का सुख विधाता ने लिखा ही नहीं है। यह बात सुनकर दोनों के ह्रदय पर भीषण वज्रपात सा हुआ और काफी सोच को प्राप्त हुए मन व्याकुल हो गया कुछ कह न सके!... कुछ समय पश्चात धीरज धारण करके पंडित आत्माराम जी बोले गुरु जी आपके जीवन भर की भक्ति का यह कैसा फल हमें देखने मिल रहा है क्या हमारी इच्छा कभी पूर्ण नहीं होगी क्या कोई भक्त गुरु और ईश्वर पर भरोसा करेगा ?...

गुरु जी निरुत्तर हो गये...

अंततः गुरु तर्पण नाथ जी काफी ज्ञानोपदेश दिए, नीति की बातें समझाई परन्तु आत्मराम जी को कुछ भी समझ नहीं आया, और अपने हठ पर अडिग रहे। अंत में गुरु जी ने कहा की आत्माराम तुम्हारी पुत्र प्राप्ति की लालसा अवश्य पूर्ण होगी,तुम्हारे बाँझपन का कलंक मिट जायेगा परन्तु मुझे एक वचन चाहिए... कि जब तुम्हारी संतान ५ वर्ष की हो जाएगी मुझे सौंप दोगे... इस बात पर पंडित आत्मराम जी पुनः शोक को प्राप्त हुए कि खुशियाँ हमारे आँगन में आकर फिर वापस चली जाएगी... तो गुरु जी मन की बात भांप लिए और कहा... आत्माराम सोंच को त्याग दो तुम्हारी संतान बहुत तेजस्वी और जन-कल्याणकारी होगी जिसका यश कीर्ति संसार में फैलेगा जिसके कारण तुम्हारा भी नाम अमर होगा और इसके कारण तुम्हारी भी पूजा होगी , यद्दपि यह बालक हमारे पास ही रहेगा परंतु जब भी इस बालक की मोह ( ममता ) तुम्हे विचलित करेगी तत्पश्चात ही तुम मिलने आ सकते हो। यह बात सुनकर पंडित आत्माराम पत्नी ज्ञानमती की वेदना कम हुई और धैर्य धारण करके कहा मुझे आपकी आज्ञा शिरोधार्य है, गुरु तर्पण नाथ महाराज जी ईश्वर का ध्यान किये और प्रसाद एवं पुत्र प्राप्ति का आशीर्वाद देकर शिव जी के तप में लीन हुए, दोनों दम्पति गुरु के चरणों में सिर नवाकर अपने गृह को गये । गुरु द्वारा मिला हुआ प्रसाद माता ज्ञानमती जी ईश्वर एवं गुरु का स्मरण करके ग्रहण किया। समय बीता ... माता ज्ञानमती गर्भावस्था को प्राप्त हुयी और धीरे-धीरे इन्तजार की घड़ियाँ भी समाप्त हुई जिस पल का बेसब्री से इंतज़ार था वह पावन दिन आ गया ।

शुभ समय कार्तिक शुक्ल पक्ष एकादशी का पावन दिन सन् १२४४ ई. को ब्रम्ह मुहूर्त में एक बहुत ही सुन्दर सुकोमल तेजस्वी बालक का जन्म हुआ । बहुत वर्षो पर्यंत सूने पड़े घर में बालक की किलकारियाँ गूँज उठी नगर की महिलाओं ने सोहर व मंगल गीत गाकर खुशियाँ व्यक्त की बालक की छवि देखकर माता -ज्ञानमती पिता -आत्माराम जी के मन में खुशियाँ का समुद्र उमड़ पड़ा था दोनों हाथ जोड़कर गुरु जी को बहुत-बहुत धन्यवाद और गरीब व दीन-दुखियों तथा ब्राह्मणों को दिल खोलकर दान किये और कुछ दिन के उपरांत माता -पिता अपने तेजस्वी पुत्र को लेकर गुरु का आशिर्वाद प्राप्त करने आते हैं । गुरु तर्पणनाथ अत्यंत प्रसन्न हुए । बालक की छवि कमल पुष्प की भांति सुन्दर व सुकोमल होने के कारण गुरु जी ने आपका नाम कमलनाथ रखा तथा आशीर्वाद प्रदान किए।

आखिरकार वह समय आया जब बालक कमाल नाथ की उम्र ५ वर्ष की हुई तब माता-पिता ने गुरु वचन को पूर्ण करने हेतु अपने वक्ष स्थल को कठोर कर अपने पुत्र कमलनाथ को गुरु तर्पणनाथ जी के चरणों में समर्पित कर दिए तत्पश्चात इस तेजस्वी बालक की देख-रेख शिक्षा-दीक्षा गुरु द्वारा प्राप्त होने लगी गुरु तर्पणनाथ जी से प्राप्त ज्ञान व विद्या को आप आसानी से सीख जाते और हमेशा शिव की उपासना एवं बचपन से ही ईश्वर में लीन रहा करते। समय बीतता गया आप सभी विद्याओं में निपुण हो गए । अपनी ज्ञान कौशलता के कारण पांच सौ शिष्यों में सबसे श्रेष्ठ एवं ज्ञानी हुए । गुरु की भांति ही जन कल्याण करते, हमेशा गुरु की सेवा में तत्पर रहते। कालान्तर में गुरु तर्पणनाथ जी समाधिस्थ होने से पहले अपना समस्त कार्यभार अपने परम् प्रिय शिष्य कमलनाथ जी को सौंपकर समाधिस्थ हुए।

अपने गुरु के द्वारा प्राप्त विद्याओं एवं अलौकिक शक्तियों और ईश्वरीय तपोबल से जन-कल्याण करने लगे और आपका यश कीर्ति दूर-दूर तक फैलने लगी भक्तों व श्रद्धालुओं का आवागमन बढ़ता गया | आप अपने गुरु तर्पण नाथ जी के तपोस्थली से ५०० मीटर दूर उत्तर दिशा में टेढ़ी नदी ( वर्तमान समय में तालाब ) के किनारे मनोहारी उपवन में ईश्वर की उपासना किया करते थे, जहाँ वर्तमान में आज आपकी समाधि स्थल विद्यमान है |

आपकी की यश की ख्याति सुनकर मध्य प्रदेश के सतना जिले के राजा रानी जो कुष्ट रोग से ग्रसित थे बहुत उपचार के बाद दोनों (कमला नगर) किछौछा धाम में आये आपके चरण में सर नवाकर आपकी विनय स्तुति प्रार्थना किये जिससे प्रसन्न होकर आप राजा रानी को आदेश दिए कि आप दोनों नदी में ईश्वर का स्मरण कर ॐ नमः शिवाय मंत्र का उच्चारण करते हुए स्नान कीजिये आपके आदेशानुसार राजा रानी दोनों मिलकर ईश्वर का ध्यान करके ॐ नमः शिवाय मंत्र का उच्चारण करते हुए ५ डुबकी लगाए तत्पश्चात जैसे ही उनकी दृष्टि अपने शरीर पर पड़ी तो उन्होंने देखा की कुष्ट रोग समाप्त हो चूका था उन्हें ऐसा प्रतीत हो रहा था की हमें कोई रोग ही नहीं था तदुपरान्त आपके नाम का जय उद्घोष करते हुए आप के चरणों में गिर कर कहा की आपकी कृपा व आशीर्वाद से हमें नया जीवन मिला है हम आपका गुणगान जीवन पर्यन्त करते रहेंगे... राजा रानी ने कहा की आपका नाम कमलनाथ नहीं पंडित कमाल होना चाहिए तभी से आप पंडित कमाल अथवा कमाल पंडित के नाम से विख्यात हुए । श्री बाबा कमाल पंडित जी का गुण-गान करते हुए आप से आज्ञा लेकर राजा व रानी अपने घर को वापस जाने के लिए प्रार्थना किये तो बाबा कमला पंडित जी ने दोनों राजा-रानी से कहा कि- जाओ और ईश्वर का नाम जपते रहना, राजा-रानी बाबा कमाल पंडित जो को दण्डवत् प्रणाम करके अपने घर चले गये।

राजा-रानी अपने राज्य में पहुँचे तो वहाँ के नगर निवासी राजा से पूछने लगे महाराज आप इस रोग से कहाँ से और कैसे मुक्त हुए,लोगों के पूछने पर राजा ने बताया कि किछौछा धाम, प्रान्त-अवधपुर( वर्तमान अयोध्या )के बाबा गुरु तर्पणनाथ जी के शिष्य श्री बाबा कमाल पंडित जी के चमत्कार से हम दोनों पति-पत्नी इस रोग से मुक्त हो गये और ऐसे अनगिनत घटनायें रोज वहां होती है,जिसे बता पाना दुष्कर कार्य है।

आप अपने गुरु के ५०० शिष्यों में सर्वश्रेष्ठ थे तथा आपके शिष्यों में मुख्य स्वामी पवार जी आपके करीबी थे आपकी सेवा करते तथा स्वामी चन्द्रिका देव आपकी सुरक्षा में हमेशा तत्पर रहा करते थे आप अपने गुरु तर्पण नाथ जी की भांति ही जनकल्याण करते रहे आपकी शरण में जो भी रोते हुए आता वह आपके कृपा प्रसाद से हँसते हुए जाता। वर्षों उपरांत जब आपकी इच्छा ब्रम्हलीन होने की हुई तो आप अपना कार्य-भार और कार्यालय की गरिमा भंग न हो इसके लिए करीबी शिष्य भक्त पवार को आदेश दिए की आप ही यहाँ के रख-रखाव देख-रेख व आने वाले श्रद्धालुओं को किसी भी प्रकार की परेशानी न हो जिम्मेदारी संभालें मैं तुम्हारी सेवा से प्रसन्न हूं तुम्हारी आने वाली पीढ़ियां मेरी सेवा भक्ति करती रहेंगी मैं सदैव तुम्हारे साथ रहूँगा मेरी कृपा सदैव मेरे सेवकों पर रहेगी और उन्ही के द्वारा पूजा,हवन,जाप आदि मुझे अवश्य ही स्वीकार होगा।

मेरे समाधिस्थ होने के लिए समाधि बनाने की तैयारी करो यह वाक्य सुनकर भक्त पवार सभी शिष्य अत्यंत चिंतित और व्याकुल हो गये और फिर गुरु के आदेशानुसार चौकोनी समाधि की खुदाई आरंभ की कुछ ही समय में समाधि तैयार हो गयी पंडित कमला जी महाराज ( कमलनाथ ) समाधि में प्रवेश से पूर्व ही शिष्यों को आदेश दिए की मेरे समाधिस्थ होने के पश्चात ऊपर से ढ़क देना मैं सदा तुम्हारे साथ ही रहूँगा और समाधि में प्रवेश कर योग-मुद्रा में लीन हुए ऊपर से शिष्यों ने समाधि का आवरण किए। लगभग १ माह बीता शोकाकुल शिष्यों से रहा नहीं रहा गया और अपना धीरज त्याग चुके थे तथा गुरु जी के बिना अधीर हो चुके थे अतः गुरु श्री कमला पंडित जी महराज की स्थिति को जानना चाहा और भक्त पवार ने समाधि के उपरी आवरण को हटाकर देखने की कोशिश की और जैसे ही आवरण हटाया ही था कि कई सूर्यों सा जैसा तेजपुंज चारों तरफ ब्याप्त हो गया, किसी को कुछ समझ नहीं आया भयभीत होकर कांप उठे तुरंत ही उन्होंने उस आवरण को पूर्ववत् रख दिया और सभी लोग मिलकर स्तुति, ईश्वर से प्रार्थना करने लगे । कुछ समय पश्चात् वह दिव्य तेज शान्त हुआ । सभी शिष्य प्रतिदिन आपकी समाधि पर आपका पूजन करते रहते ।

आपका ब्रम्हमय तेज-पुंज स्वरुप यह समाधि स्थल युगों-युगों तक समस्त मानव-जाति का कल्याण करने वाला , मनोवांछित फल प्रदान करने वाला, रोग दुःख ,बलाय-बाधा,ग्रह शांति प्रदान करने वाला निवारण करने वाला सिद्ध पीठ सदा पूज्यनीय है ।

सन १३८०ई. में अगहन मास की पूर्णिमा की तिथि को आप समाधिस्थ हुए । तभी से अगहनिया मेले की सुरुआत भी हुई, भक्त पवार कार्यालय की सेवा तथा देख रेख करने लगे और उन्ही की पीढ़ी दर पीढ़ी आपकी सेवा करते चले आ रहे हैं,आपकी (भक्त पवार जी महाराज )आठवीं पीढ़ी स्वामी संत प्रसाद जी को अप्रत्क्ष रूप से दर्शन दिए, हर कार्य के लिए आदेश देते और आप १५ दिसम्बर २०१९ ई. में नश्वर शरीर को त्याग कर पञ्च तत्व में विलीन हुए, इन्ही के सुपुत्र वर्तमान महंथ स्वामी श्री रामनयन जी महराज एवं पुजारी श्री रामशंकर जी महराज, पुजारी श्री श्यामसुंदर, पुजारी श्री मुरली प्रसाद जी के देख रेख में प्रतिवर्षकार्तिक शुक्ल पक्ष एकादशी के दिन बड़े ही परम पूज्यनीय अनंत बाबा श्री कमला पंडित जी महाराज की जयंती हर्सोल्लास के साथ मनाया जाता है जो की ३ तीन दिवसीय कार्यक्रम होता है जिसमें दूर दराज से हजारों की संख्या में लोग आते हैं दर्शन करते हैं उनकी ब्रम्ह बाधा कुष्ट रोग संतान हीनता, पागलपन,आदि प्रकार की बलाय से मुक्ति मिलती है आपके शरण में हर संप्रदाय के लोग आते हैं उनकी मनोकामना पूर्ण होती है दरगाह में आये हुए सभी भक्त, श्रद्धालुओं का दर्शन आपके बगैर दर्शन किये अधूरा ही रहता है ।