श्री कमाल चालीसा

दोहा

बाबा कमाल ब्रम्ह के, चरणों का करि ध्यान।
चालीसा प्रस्तुत करूँ, पावन यश गुण गान ।।

चौपाई

जै कमाल ब्रम्ह हितकारी, जेहि पूजत नितनर अरूनारी।
हर कष्ट तम नाशन जोई, ब्रम्ह धाम मंह-राजत सोई ।
निगुर्ण निराकार जग व्यापी, प्रकट भये बन ब्रम्ह प्रतापी।
अनुभव गम्य प्रकाश स्वरूप, सोई प्रभु प्रकट ब्रम्ह के रूप ।
जगत प्राण जग जीवन दाता,ब्रम्ह कमाल हुए विख्याता।
मन बच अगम अगोचर स्वामी कमाल ब्रम्ह सोई अन्तर यामी ।
कमाल ब्रम्ह जी है ब्रम्ह चारी, चन्द्रिका देव इनके दरबारी।
कमला नगर सुखधाम मनोहर जहाँ विराजत ब्रम्ह निरन्तर ।
पीत जनेऊ काँधे सोहै, पग खड़ाऊं त्रिशूल कर सोहे।
जटा जूट अस बाहु विशाला,ब्रम्ह गले पुष्पों की माला।
ब्रम्ह तेज वधिर्तव तव क्षण-क्षण प्रभुदित होत निरन्तर जनर ।
ज्ञानमती के तन तुम्ह जाये, तर्पण नाथ से दीक्षा पाये।
भक्त पवार को आज्ञा दीन्हा, सन्त प्रसाद को दर्शन दीन्हा ।
सब भक्तन के पालक तुम हो दनुज वृन्ति कुल घालक तुम हो।
पागल बन विचार जो खोवे, देखत कबहुँ हँसे फिर रोवै ।
तुम्हरे निकट आव जब सोई, भूत पिशाच ग्रसत उर होई।
तम्हरे धाम आई सुखमाने करत विनय तुमको पहिचाने ।
तब दुघर्ष तेज के आगे, भूत पिशाच विकल होई भागे।
कुष्ठ रोग से पीड़ित होई, आवे सभय शरण वीक सोई ।
भक्षण करे भभुत्र तुम्हारा चरण गहे नित बारहिं बारा।
परम रूप सुन्दर सोई पाव जीवन भर तव यश नित गावें ।
अर्जी देकर हवन कारावत भूत पिचाश निकट नहिं आवत।
यज्ञ स्थल तव धाम नीमतर हवन यज्ञ जहँ होत निरंतर ।
भांति-भांति के कष्ट अपारा करि उपचार मनुज जब हारा।
जाको पुत्र होई नही भाई, सो नर यहि विधि करै उपाई।
कमाल पडित जी धाम पधारे श्रमित अमित जन मन से हारे ।
शाल जनेऊ लगोंट चढ़ावे, लड्डू पेड़ा भोग लगावै।
ब्रम्ह चरण परि पूजा करई, सोमवार को व्रत अनुसराई ।
ब्रम्ह स्थल पर ध्यान लगावै, चालीसा का पाठ करावै।
श्रद्धा अरू विश्वास बटोरी बांधे तिन्हहि प्रेम की डोरी।
कृपा करहिं तेंहि पर करूणाकर कष्ट मिटे लाटै प्रभुदित घर।
कमाल ज्योति का दीपक लावै,प्रेम सहित निज घर में जलावें ।
वर्ष-वर्ष जब दर्शन करहीं भक्ति भाव श्रद्धा उर भर हीं।
दे सतांन सृजन तब करते, कष्ट मिटावत जन भय हरते ।
तुम व्यापक सबके उर अन्तर, जानहु भाव- कुभाव निरतंर।
मिटे कष्ट नर अति सुख पावे, जब तुमको उर मध्य बिठावे ।
करत ध्यान अभ्यास निरंतर तव होवहि प्रकाश उर अन्तर।
देखहि शुद्धस्वरूप तुम्हारा, अनुभव गभ्य विवेक सहारा।
सदा एक इस जीवन भोगी, ब्रहम रूप तव होई हहि योगी ।
सिघांसन बैठे योगीसन ध्यान मग्न अविचल अनतर्मन।
अनुभव करहि प्रकाश तुम्हारा होकर द्वैव भाव से न्यारा ।
पाठ करत बहुधा सकाम नर, पूर्ण होत अभिलाषा शीघ्रतर।
नर नारी गण युग कर जोरे विनवत चरण परत प्रभु तोरे ।
भूत पिशाच प्रकट होई बोले, गुप्त रहस्य शीघ्र ही खोले।
ब्रहम तेज तब सहा न जाई छोड़े देह तब चले पराई ।
जो यह पाठ केरे मन लाई तापर ब्रहम जी होत सहाई ।
जाको कर्ज सतावै भारी पाठ करै सोई पावन कारी।
पंडित एकादशी को लावै, ध्यान पूर्वक हवन करावैं।
निश्चय त्रण मोचन होई जाई, यह मत संत प्रसाद की भाई।
एक सौ आठ पाठ कर सोई नाशै शत्रु महा सुखहोई।
संतप्रसाद सदा तव चेरा कीजैनाथ ह्रदय मह डेरा।

दोहा

जय श्री कमाल पंडित जी, पूर्ण होय सब काम।
परम तेज मय बसहुं तुम, भक्तों के उर धाम।।

प्रार्थना

पितु मातु सहायक स्वामी -सखा, तुमही एक नाथ हमारे हो |

जिनके कछु और आधार नही ,तिनके तुमही रखवारे हो ||1|| पितु मातु.......

सब भांति सदा सुखदायक हो, दुःख दुर्गुण नाशन हारे हो ||2||पितु मातु.......

प्रतिपाल करो सगरे जगको , अतिशय करुणा उर धारे हो ||3||पितु मातु.......

भुलि हैं हमहीं तुमको तुम तो ,हमरी सुधि नाहिं बिसारे हो ||4||पितु मातु.......

उपकारन को कछु अंत नही , छिनही छिन जो विस्तारे हो ||5||पितु मातु.......

महाराज महा महिमा तुम्हरी , समुझे विरले बुधिवारे हो ||6||पितु मातु.......

शुभ शांति निकेतक प्रेमनिधे , मनमंदिरके उजियारे हो ||7 ||पितु मातु.......

इस जीवनके तुम जीवन हो , तुम प्राण से भी मुझे प्यारे हो ||8|| पितु मातु.......

तुमसो प्रभुपाॅय कमाल हरी , केहिके अब और सहारे हो ||9 ||पितु मातु.......

आरती श्री कमला बाबा जी की

दोहा

जय हो बाबा श्री कमाल पंडित जी, विनय करूँ कर जोर
मैं दुखिया तेरे द्वार खड़ा वेगि हरहूँ दुःख मोर ||

आरती श्री कमला पंडित की, भूत दलन दुख काटैं जन की
पिता आत्माराम कहायो, ज्ञानमती माता तन पायो
संगत की तुम संत जनन की || आरती श्री.....

तर्पणनाथ हैं गुरु तुम्हारे, बल - बुद्धि - विद्या में अति न्यारे
ब्रम्ह-ज्ञान लियो तन मन की ||आरती श्री........

गुरु कृपा प्रसिद्ध तुम्हारे, तुम्हे सभी पूजे नर -नारी,
पूर्ण होय इक्षा जो जन की || आरती श्री कमला.....

उत्तर दिशी मंदिर अति भारी, क्या शोभा वरणो छवि न्यारी,
हवन होत टोली भागै भूतन की || आरती श्री कमला.....

शाल -लंगोट -जनेऊ सोहे, पद खड़ाऊं -त्रिशूल कर मोहे !
भोग लागत घी -फल- लडुवन || आरती श्री....

खाक मलै तन में मन लाई , कुष्ट रोग ताकर छुटी जाई
रोग -दोख ब्रम्ह भागै तन की || आरती श्री कमला....

जो आरती गावै मन लायी, तापर ब्रम्ह जी होत सहाई
छड़ में सब काटैं दुख तन की || आरती श्री कमला....

ॐ जय श्री कमाल हरे

ॐ जय श्री कमाल हरे, बाबा जय श्री कमाल हरे ......
किछौछा धाम विराजत, अनुपम रूप धरे l lॐ जय श्री .....

रत्न जड़ित सिंहासन, सिर पे चँवर ढुरे l
पीताम्बर तन राजत, कुण्डल श्रवण परे l l ॐ जय .....

गले पुष्पों की माला, कर में त्रिशूल धरे l
हवन होत है दर पे, दीपक ज्योति जरे l l ॐ जय श्री .....

जनेऊ, लंगोट खड़ाऊं, लडुवन थाल भरे l
सेवक भोग लगावत, सेवा नित्य करे l l ॐ जय श्री .....

भूत पिशाच बाबा के, दर पे रोज जरे l
दुखियन के दुख हरते, पूरण काज करे l l ॐ जय श्री .....

ढोलक झाल मजीरा , शरण में शंख बजे l
भक्त आरती गावे, सेवा नित्य करे l l ॐ जय श्री .....

जो ध्यावे फल पावे, सब दुख से उबरे l
सेवक जन निज मुख से, श्री कमाल उचरे l l ॐ श्री .....

श्री कमाल पंडित जी की आरती, जो कोई जन गावे -२
कहत संत प्रसाद जी, मन वांछित फल पावे l l ॐ जय श्री..........

श्री पंडित कमला बाबा जी की स्तुति

दोहा

कमला गुन जो गहहिं मन , परिहरि वारि विकार ।
तिनकी सब बाधा कटैं , मनोरथ होई सकार ।।

जय कमाल ब्रहम कृपालु , मेरी अरज सुन लीजिए ।
मैं शरण तिहारी गिरा पड़ा हूँ , नाथ दर्शन दीजिए ।।

मैं करूँ विनती आप से , प्रभु तुम दया मुझ पर करो ।
चरणों का ले लिया आसरा , प्रभु वेगि से मेरा दुख हरो ।।

सिर पर जटा कर में सोटा , गले बीच रूद्राक्ष माल हैं ।
जो करें दर्शन प्रेम से , सब कटत तन के जाल हैं

तुम सब तरह समर्थ हो , भक्तों के पूरण काम हो ।
भूतों से तारन हार हो , प्रभु सकल सुख के धाम हो ।।

मैं हूँ आज्ञानी बालक , मेरी बुद्धि को निर्मल करो ।
अज्ञानता का अंधेरा है उर में , प्रभु ज्ञान का दीपक धरो ।।

सब मनोरथ पूर्ण करते, जो कोई सेवा करे।
शाल जनेऊ घृत मेवा,भेंट ले आगे धरे।।

करना खता सब माफ मेरी , जो चूक हरदम साथ है ।
मेरी कामना पूरण करो , अब लाज तुम्हारे हाथ है ।।

दरबार में आया तेरी , ब्रहम देव मैं हाजिर खड़ा ।
इन्साफ मेरा अब करों , चरणों में आकर मैं हूँ पड़ा ।।

अर्जी मैं तुमको दे चुका , अब गौर मुझपर कीजिए ।
तत्काल इस पर हुक्म कर दो , फैसला कर दीजिए ।।

मैं सन्त सेवक आपका, मुझको नहीं बिसराइए।
जय जय करूँ मैं आपकी, नैया को पार लगाइए ।।

मैं सुयश सुनकर दूर से, आया तुम्हारे पास हूँ।
हवन कराया आपका, औ मैं अज्ञानी दास हूँ ।।

स्त्री पुरूष सब दूर से आके, चरणों की आस लगाये हैं।
अब नाथ आकर दर्श दो, आँखों के अश्रु सुखाये हैं ।।

प्रभु कमाल की यह स्तुति, जो नेम से गाया करे।
सब सिद्ध कारज होय उसकी, रोग सब हरे ।।

दोहा

कमला स्तुति जो पढ़े, प्रेम सहित मन लाय।
उसकी निर्मल बुद्धि हो, होय कमाल जी सहाय ।।

प्रार्थना - 1

जय कमाल पंडित बाबा जय कमाल देवा।। जय कमाल...

कृपा की न होती जो आदत तुम्हारी।
तो सूनी ही रहती अदालत तुम्हारी ।।

जो दीनों के दिल में जगह तुम न पाते।
न तुम होते हाकिम न हम होते मुलजिम ।।

न दीनों के दिल में जगह तुम न पाते।
न घर-घर में होती इबादत तुम्हारी ।। जय कमाल...

गरीबों की दुनियां है आबाद तुमसे।
गरीबों से है बादशाहत तुम्हारी।।

सुजश सुनकर आप की दुखिया तो आयें दूर से।
सब स्त्री पुरूष आकर चरण परे हुजूर के ।।

लीला है अदभुत आपकी महिमा तो अपरम्पार है।
सब भूत प्रेत पिशाच बाँधे कैद करत सरकार है ।।

जय कमाल पंडित बाबा जय कमाल देवा ।जय कमाल...

2 - प्रार्थना दुःख दूर कर हमारा

दुःख दूर कर हमारा, संसार के रचैया।
जल्दी से दो सहारा, मझधार में है नैया || 1 ||

चारो तरफ से हम पर, गम की घटायें छाई।
सुख का करो उजाला, सुप्रकाश के करैया।।2 ।।दुःख दूर...

डूबा जहाज मेरा, इक बारगी भँवर में।
मल्लाह तुम हुए अब, कोई नहीं खिवैया।।3 ।।दुःख दूर...

इक तख्त के सहारे, भगवन मैं तिर रहा हूँ।
ईश्वर तु या खूदा है, तु ही फकत बचैया।।4 ।।दुःख दूर...

सुख के सब हैं साथी, दुनिया के यार सारे।
तेरे सिवा नहीं अब, धीरज कोई धरैया।।5 ।।दुःख दूर...

अब डूबने में मेरे, कुछ भी कसर नहीं है।
कर कृपा मेरा बेड़ा, पतवार के लगैया।।6 ।।दुःख दूर...

तुम बिन कोई हमारा, रक्षक नहीं यहाँ पर।
ढूंढा जगत ये सारा, तुझसा नहीं बचैया।।7 ।।दुःख दूर...

अच्छा बुरा हुँ जैसा, राजी में 'राम' रहता।
यह दास है तुम्हारा, सुधि लेउ सुधि लिवैया।।8 ।।दुःख दूर...